गणेशस्तवन [ओवी]
रत्नमंचकी आसन | बैसे वरी गजानन |
भक्त आम्ही हीनदीन | ध्यातो तुज गजानना ||१||
विश्वरूपी तो आकार | आदिनाथ तो ओंकार |
मन झाले एकाकार | वंदीताच गजानना ||२||
प्रभावळी सुर्यकुंज | चौरंगी बिंबते तेज |
मुषकारूढ तू गज | ध्यातो तुज गजानना ||३||
विद्याभ्यास संजीवन | देत अमृतरसपान |
होतसे दूर अज्ञान | वंदीताच गजानना ||४||
काय वर्णू मी वर्णन | असे बालक अजाण |
सगुणात तू निर्गुण | ध्यातो तुज गजानना ||५||
चिरंजीव तो आधार | दुर्गुणे करी संहार |
ओंकारात ये झंकार | वंदीताच गजानना ||६||
तू शंकर गौरीसुत | भजती देव नमित |
गणांचे तू अधिपत्य | ध्यातो तुज गजानना ||७||
वेदगुणामाजी असे | चराचरात तो दिसे |
मनी तो विराजितसे | वंदीताच गजानना ||८||
अविरत तुझे ध्यान | हीच असे माझी आण |
साकार तू ते संधान | ध्यातो तुज गजानना ||९||
पूर्ण साधीतसे सिद्धी | देह झाला शुद्ध बुद्धी |
मनी वसे हीच रिद्धी | वंदीताच गजानना ||१० ||
अकराश्लोकी संपूर्ण | नैवेद्य तुज अर्पण |
तुझे कृपेने संपूर्ण | सांभाळी तू गजानना ||११||
-----कविता
रत्नमंचकी आसन | बैसे वरी गजानन |
भक्त आम्ही हीनदीन | ध्यातो तुज गजानना ||१||
विश्वरूपी तो आकार | आदिनाथ तो ओंकार |
मन झाले एकाकार | वंदीताच गजानना ||२||
प्रभावळी सुर्यकुंज | चौरंगी बिंबते तेज |
मुषकारूढ तू गज | ध्यातो तुज गजानना ||३||
विद्याभ्यास संजीवन | देत अमृतरसपान |
होतसे दूर अज्ञान | वंदीताच गजानना ||४||
काय वर्णू मी वर्णन | असे बालक अजाण |
सगुणात तू निर्गुण | ध्यातो तुज गजानना ||५||
चिरंजीव तो आधार | दुर्गुणे करी संहार |
ओंकारात ये झंकार | वंदीताच गजानना ||६||
तू शंकर गौरीसुत | भजती देव नमित |
गणांचे तू अधिपत्य | ध्यातो तुज गजानना ||७||
वेदगुणामाजी असे | चराचरात तो दिसे |
मनी तो विराजितसे | वंदीताच गजानना ||८||
अविरत तुझे ध्यान | हीच असे माझी आण |
साकार तू ते संधान | ध्यातो तुज गजानना ||९||
पूर्ण साधीतसे सिद्धी | देह झाला शुद्ध बुद्धी |
मनी वसे हीच रिद्धी | वंदीताच गजानना ||१० ||
अकराश्लोकी संपूर्ण | नैवेद्य तुज अर्पण |
तुझे कृपेने संपूर्ण | सांभाळी तू गजानना ||११||
-----कविता
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