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Monday, 16 July 2012

गणेशस्तवन [ओवी]

गणेशस्तवन [ओवी]

रत्नमंचकी आसन | बैसे वरी गजानन |
भक्त आम्ही हीनदीन | ध्यातो तुज गजानना ||१|| 

विश्वरूपी तो आकार | आदिनाथ तो ओंकार | 
मन झाले एकाकार | वंदीताच गजानना ||२|| 

प्रभावळी सुर्यकुंज | चौरंगी बिंबते तेज | 
मुषकारूढ तू गज | ध्यातो तुज गजानना ||३|| 

विद्याभ्यास संजीवन | देत अमृतरसपान |
होतसे दूर अज्ञान | वंदीताच गजानना ||४|| 

काय वर्णू मी वर्णन | असे बालक अजाण | 
सगुणात तू निर्गुण | ध्यातो तुज गजानना ||५|| 

चिरंजीव तो आधार | दुर्गुणे करी संहार | 
ओंकारात ये झंकार | वंदीताच गजानना ||६|| 

तू शंकर गौरीसुत | भजती देव नमित | 
गणांचे तू अधिपत्य | ध्यातो तुज गजानना ||७|| 

वेदगुणामाजी असे | चराचरात तो दिसे | 
मनी तो विराजितसे | वंदीताच गजानना ||८||

अविरत तुझे ध्यान | हीच असे माझी आण |
साकार तू ते संधान | ध्यातो तुज गजानना ||९|| 

पूर्ण साधीतसे सिद्धी | देह झाला शुद्ध बुद्धी | 
मनी वसे हीच रिद्धी | वंदीताच गजानना ||१० || 

अकराश्लोकी संपूर्ण | नैवेद्य तुज अर्पण | 
तुझे कृपेने संपूर्ण | सांभाळी तू गजानना ||११|| 



-----कविता

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