कविता एक आर्तता
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Monday, 20 October 2014
दीप
दीप
अंतस्थ बहिस्थ
तुझे सावळे रूप
वाजवितो तू पावा
तू दूर तू समीप
तुझ्या अंगणी
माझे अंगण
अनंता अनंती
तू एकला दीप
----कविता
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